धैर्य कैसे अब धरूँ मैं....डॉ.अमित कुमार दवे, खड़गदा
© *धैर्य कैसे अब धरूँ मैं...* डॉ.अमित कुमार दवे,खड़गदा मृत्यु का उपहास होते , मानवता को सूली चड़ते होते सॉसों का सौदा देख धैर्य कैसे अब धरूँ मैं…? नित नीचे गिरते संवाद संग उससे भी नीचे गिरते.. आपसी सम्बंधों को देख..धैर्य कैसे अब धरूँ मैं…? सपनो को चूर चूर होते, डोर जीवन के नाम लिलते देख चिताओं की कतारें...धैर्य कैसे अब धरूँ मैं….? घरों को शमशान होते,नाम पुत्र के माँ-बाप को रोते देख..रोज की अर्थी निकलते..धैर्य कैसे अब धरूँ मैं..? नाटक सबके परवान होते, बातों बातों में हैवान होते.. छोड़ जिम्मेदारी को बातों के विद्वान होते देख लोगों को बतलाओ!धैर्य कैसे अब धरूँ मैं धैर्य कैसे अब धरूँ मैं..? सादर सस्नेह ©डॉ.अमित कुमार दवे, खड़गदा