समाज और राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा डॉ. अमित कुमार दवे, खडगदा
समाज और राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा डॉ. अमित कुमार दवे, खडगदा वर्तमान समाज पर एवं उसके व्यवहार पर विचार करें तो हम पाते हैं कि समाज की गति क्या हो रही है ? समाज अपनी गौरवमयी एवं मर्यादा युक्त समृद्धता की पहचान से विलग कैसे होता जा रहा है ? वर्तमान की अर्थवादिता, भौतिकवादिता एवं पाश्चात्य अंधानुकरण समाज की नींवों को खोखला करता जा रहा है। जहाँ समाज व संस्कृतियाँ खोखली होती जाएंगी, उस राष्ट्र का अस्तित्व चिरगामी हो, यह आवश्यक नहीं । भारतीय समाज एवं राष्ट्र आज तक अपनी संस्कृतियों परंपराओं एवं सार्वभौमिक मूल्यों के कारण विषम से विषम परिस्थितियों में आहत होते हुए भी अडिग- सा खड़ा है । लगभग 1500 वर्षों तक सांस्कृतिक एवं सामाजिक उत्पीड़न के पश्चात भी कोई राष्ट्र अपने सामर्थ्य पर खड़ा बढ़ रहा है तो निश्चित ही इसकी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक पक्ष नींवों का सिंचन करने में समर्थ हो रहा है। तथापि विघटन व विचलन की मात्रा वर्तमान जन जीवन में बढ़ती दिखाई दे रही है। जिसका दुष्प्रभाव भावी पीढ़ी समझ नहीं पा रही है । यदि इसी तरह भावी पीढ़ी विवेक शून्य हो व्यव...