Posts

समाज और राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा डॉ. अमित कुमार दवे, खडगदा

समाज और राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा  डॉ. अमित कुमार  दवे, खडगदा वर्तमान समाज पर एवं उसके व्यवहार पर विचार करें तो हम पाते हैं कि समाज की गति क्या हो रही है ? समाज अपनी गौरवमयी एवं मर्यादा युक्त समृद्धता की पहचान से विलग कैसे होता जा रहा है ? वर्तमान की अर्थवादिता, भौतिकवादिता एवं पाश्चात्य अंधानुकरण समाज की नींवों को खोखला करता जा रहा है। जहाँ समाज व संस्कृतियाँ खोखली होती जाएंगी, उस राष्ट्र का अस्तित्व चिरगामी हो, यह आवश्यक नहीं । भारतीय समाज एवं राष्ट्र आज तक अपनी संस्कृतियों परंपराओं एवं सार्वभौमिक मूल्यों के कारण विषम से विषम परिस्थितियों में आहत होते हुए भी अडिग- सा खड़ा है ।  लगभग 1500 वर्षों तक सांस्कृतिक एवं सामाजिक उत्पीड़न के पश्चात भी कोई राष्ट्र अपने सामर्थ्य पर खड़ा बढ़ रहा है तो निश्चित ही इसकी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक पक्ष नींवों का सिंचन करने में समर्थ हो रहा है। तथापि विघटन व विचलन की मात्रा वर्तमान जन जीवन में बढ़ती दिखाई दे रही है। जिसका दुष्प्रभाव भावी पीढ़ी समझ नहीं पा रही है । यदि इसी तरह भावी पीढ़ी विवेक शून्य हो व्यव...

जल साक्षरता : प्रगतिशील शिक्षित समाज के लिए अनिवार्य : डाॅ. अमित कुमार दवे

जल साक्षरता :  प्रगतिशील शिक्षित समाज के लिए अनिवार्य  डॉ. अमित कुमार  दवे, खड़गदा  जल साक्षरता के संबंध में जब विचार अथवा चर्चा की जाती है तो लगता है जल साक्षरता एक सामान्य सा मुद्दा है । “ सभी लोगों को जल के संबंध में जागरूक होना चाहिए, जल संरक्षण एवं शुद्धि के संबंध में सचेत होना चाहिए।” इसी बात को ध्यान में लाएँ- हटाएँ भुला दिया जाता है। निस्संदेह  विश्व में 71 प्रतिशत जल है। किंतु किसी ने यह सोचा कि जहाँ जल है वहाँ जल प्रलय दिखता है और जहाँ जल नहीं है वहाँ अकाल की स्थितियां क्यों हैं?  यही जानना, समझना एवं भावी पीढ़ी को समझाना जल साक्षरता है, न कि जल से संबंधित ज्ञान, समझ व जागरूकता का कक्षा कक्ष में औपचारिक  शिक्षण । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि पेयजल, दैनिक उपयोग व सिंचाई के जल की स्थितियां असंतुलित-सी हो गई हैं। जल स्रोत केवल कूड़ाघर बने पड़े हैं। भूमि जल के असंतुलित दोहन से निरंतर पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है । जहाँ जल है वहाँ जल प्रलय दिखता है, जहाँ जल की कमी है वहाँ अकाल  का सामना करने का संघर्ष दिखता है।  श...

🇮🇳राष्ट्रैव सर्वस्वम् 🇮🇳©डॉ. अमित दवे

🇮🇳राष्ट्रैव जीवनम्, राष्ट्रैव मरणम्, राष्ट्रैव  धर्मम्, पृथक् राष्ट्रैव  न कोSपि- कर्मम्।।🇮🇳 ©डॉ. अमित दवे

लोक बोध ११

।।न अरिः जगति यस्याः सा नारी।। © डॉ.अमित दवे, खड़गदा

तर्क एवं बहस डॉ. अमित कुमार दवे

तर्क एवं बहस   डॉ. अमित कुमार दवे तर्क साक्ष्य आधारित बिन्दु के संबन्ध में स्पष्टीकरण है जबकि बहस  विचारधारा पर निर्भर करती है।  किसी तथ्य के संबंध में हर व्यक्ति, संगठन, समुदाय की अलग विचारधारा हो सकती... वह अपने पक्ष को स्थापित करने के लिए अनर्गल तर्कों को भी प्रस्तुत कर सकता है। अनर्गल तर्काधारित बहस का कोई छोर नहीं होता। जबकि तथ्यात्मक विषयवस्तु अपने आप में तार्किक होती है। ऊसे अन्य तर्कों की कसौटी पर परखने की आवश्यकता नहीं रहती। सूर्य पूर्व में उदित होता है। यह तथ्य है। इस संबंध में आपकी व मेरी सटीक समझ तार्किक है। इसका कोई काट्य नहीं है। तथापि सूर्य के पूर्व में उदित होने के संबंध में संशय उत्पन्न करना व इस सम्बंध में तर्क देना अनर्गल तर्क कहे जाएँगे। अनर्गल तर्क के माध्यम से संशय की स्थिति को बढावा देते हुए स्थापित तथ्य के संबंध में नकारने का प्रयास.. अथवा खण्डन बहस के अन्तर्गत रहता है। तर्क सैद्धांतिकता लिए रहता है। बहस व्यावहारिक एवं प्रत्यक्ष रहती है। © तर्क एवं बहस   डॉ. अमित कुमार दवे

ऐसा वर दो हे वीणावादिनी ©डॉ. अमित कुमार दवे, खड़गदा

ऐसा वर दो हे वीणावादिनी            ©डॉ. अमित कुमार दवे, खड़गदा ऐसा वर दो हे वीणापाणि जिससे सहज ही ऊजला - सुलझा फिर जग हो जाए। दीप उजियारों के स्वतः दीप्त हो जाएँ अज्ञान जनित अंधेरें सब पट जाएँ। नित नव पर नव हो निर्माण सृष्टि में.. जिसमें लोककल्याण निहित हो…। माया-मोह और राग-द्वेष से जग का.. हर जन मन सहज ही मुक्त हो जाए। प्रकृति का कण कण नव स्फूर्त  स्पन्दन से हर मन को हर्षा जाए…। ऐसा वर दो हे वीणावादिनी…जिससे… तेरी कृपा से ही  हे माँ ! जीवन हर्षाए नव ज्ञान-विज्ञान की तू ही सर्जयित्री, जगत् का निसदिन तू ही दिग्दर्शनकर्त्री तिमिर तन मन के स्वणतः दूर हो जाएँ हे वाणी!कुछ भाग जीवन के खिल जाएँ ऐसा वर दो हे हंसवाहिनी! …जिससे… जग जन में नव गति- नव ताल ,नव रंग नव सृजन  नव पद का सामर्थ्य भर जाए.. ऐसा वर दो हे श्वेतवासनी ! …जिससे… सादर प्रस्तुति ©डॉ. अमित कुमार दवे, खड़गदा

लैगिक संवेदनशीलता अमित दवे

समाज में महिला एवं पुरुष को न्यून-अधिक भाव से न देखें। समाज दोनों के सम भाव व सहयोग से संचालित होता है। लैंगिक संवेदनशीलता की बात हो रही है तो मैं कहना चाहता हूँ कि आजकल लडका लडकी बनने की जो होड़ दिख रही है उससे बाहर निकलें लडका लडका हघ रहे, लडकी बनने का प्रयास न करें। वहीं लड़की/महिलाएं भी अनावश्यक रूप से पुरुष/लड़का बनने का प्रयास न करें।  ईश्वर ने लड़का और लड़की को अपनी विशिष्ट प्रकृति के अनुरूप बनाया है, अतः उसका सम्मान करें। दोनों प्रकृतियों के समभाव से ही समाज,संस्कृति एवं राष्ट्र की ऊर्ध्व गति सुनिश्चित हो सकती है।  आओ!आज मिलकर संकल्प लें कि हम लैंगिक  विभेदन किए बिना जीवन, समाज एवं राष्ट्र को मजबूत करें धन्यवाद। लैगिंक संवेदनशील विषयक जागरूकता गीत  ©डॉ.अमित कुमार दवे आओ आओ बात करे हम,भेद लिंग का कम करें हम 2 लड़का लड़की एक समान, करो न इनका अब अपमान। लडकी हैं देवी का वरदान, लडके मैं बसते शिव हो ध्यान।। 1 आओ आओ बात करे हम,भेद लिंग का कम करें हम 2 नारी है घर का सम्मान, नर फिरता नित हो गाँव की शान नारी करती पालन पौषण, नर नित करता भरण रक्षण।। 2 आओ आओ बात करे हम,भेद लिं...