जल साक्षरता : प्रगतिशील शिक्षित समाज के लिए अनिवार्य : डाॅ. अमित कुमार दवे

जल साक्षरता :  प्रगतिशील शिक्षित समाज के लिए अनिवार्य 

डॉ. अमित कुमार  दवे, खड़गदा 

जल साक्षरता के संबंध में जब विचार अथवा चर्चा की जाती है तो लगता है जल साक्षरता एक सामान्य सा मुद्दा है । “ सभी लोगों को जल के संबंध में जागरूक होना चाहिए, जल संरक्षण एवं शुद्धि के संबंध में सचेत होना चाहिए।” इसी बात को ध्यान में लाएँ- हटाएँ भुला दिया जाता है। निस्संदेह  विश्व में 71 प्रतिशत जल है। किंतु किसी ने यह सोचा कि जहाँ जल है वहाँ जल प्रलय दिखता है और जहाँ जल नहीं है वहाँ अकाल की स्थितियां क्यों हैं?

 यही जानना, समझना एवं भावी पीढ़ी को समझाना जल साक्षरता है, न कि जल से संबंधित ज्ञान, समझ व जागरूकता का कक्षा कक्ष में औपचारिक  शिक्षण ।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि पेयजल, दैनिक उपयोग व सिंचाई के जल की स्थितियां असंतुलित-सी हो गई हैं। जल स्रोत केवल कूड़ाघर बने पड़े हैं। भूमि जल के असंतुलित दोहन से निरंतर पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है । जहाँ जल है वहाँ जल प्रलय दिखता है, जहाँ जल की कमी है वहाँ अकाल  का सामना करने का संघर्ष दिखता है।

 शिक्षित समाज का हर परिस्थिति में किया जाने वाला अनियोजित संघर्ष ही  असाक्षरता है । जल साक्षरता से तात्पर्य जल के स्रोतों, जल प्रबंधन एवं जल संकट से संबंधित पहलुओं पर विचार कर जन सामान्य हेतु उचित व्यावहारिक कदम उठाना एवं उठवाना है । न कि सैद्धांतिक औपचारिक पृष्ठभूमियों के शिखर गढना । 

प्रत्यक्ष समस्याओं को नजर अंदाज कर कागजी बांधों वी जल स्रोतों पर विचार व प्रबंधन जल निरक्षरता ही है । हम शिक्षित समाज को आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व के जल प्रबंधन को अपनाकर भावी जनजीवन की जल संबंधी खुशहाली की रूपरेखा तैयार करनी होगी। वर्तमान का शिक्षित समाज ही नहीं हर कोई केवल उपभोगवादी संस्कृति को अपनाता हुआ प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित व अनियोजित दोहन करने में लगा है।  यहीं से उसकी प्राकृतिक असाक्षरता के दर्शन होने लगते हैं।

 पिछले कुछ दशकों अथवा सैकड़ो वर्षों पर नज़र डालें तो हम पाते हैं कि हमारे पूर्वज जो प्राकृतिक प्रबंधन कर गए हैं उनका दैनिक जीवन में उपयोग एवं भाभी पीढ़ी हेतु अनुपयोगी बना आगे बढ़ते जा रहे हैं । किसी को कुछ भी पता नहीं है कि हमारी अगली पीढ़ी हेतु धन संपदा के साथ-साथ हम क्या छोड़ कर जा रहे हैं ? असुरक्षित हवा, पानी, वातावरण, भूमि, खान-पान आदि।

असुरक्षित संसाधनों का वर्तमान से भावी पीढ़ी को हस्तानान्तरण ही तो सभ्य एवं शिक्षित समाज की असाक्षरता का आधार बन पड़ा है। अब समय आ गया है हमें साक्षर के साथ-साथ सही मायने में समाज को सुंदर, स्वच्छ व स्वस्थ जीवन हेतु साक्षर करना है । सुंदर, स्वच्छ व स्वस्थ जीवन की संकल्पना पंचमहाभूतों की नैसर्गिक शुद्धि, उपलब्धता एवं प्रबंधन पर निर्भर करती है।

 पंचमहाभूतों की शुद्धि व भावी पीढ़ी हेतु सहज उपलब्धता ही सही मयनों में साक्षरता है । जल साक्षरता आज की परिप्रेक्ष्य में तब देखी जा सकेगी, जब हम स्वयं से, स्वयं के क्षेत्र से जल स्रोत संरक्षण संवर्द्धन एवं प्रबंधन की पहल करें व करवाएँ।

सदियों से विरासत में मिले जल स्रोतों का उपयोग तो हम कर रहे हैं किंतु हम क्या देकर जाएंगे इस बिंदु पर विचार व पहल ही सही मायनो में जल साक्षरता है। हम स्वयं के साथ, स्वयं की क्षेत्र से, जल स्रोत संरक्षण, संवर्द्धन एवं प्रबंधन की पहल करें व करवाएं।

 हम स्वयं के साथ अपने संपर्क में आने वालों को जल के संबंध में समझ एवं उपयोगी नियोजन बतलाने में समर्थ हो रहे हैं तो हम जल साक्षर हैं अन्यथा नहीं । हमारी जल साक्षरता तभी सार्थक है जब हम हमारे आस-पड़ोस व क्षेत्र में जल प्रबंधन को उचित दिशा दें , सहयोग दें व प्राकृतिक जल स्रोतों के नियोजित उपयोग व पुनर्भरण के संबंध में व्यावहारिक बन सकें।

 पिछले दो दशकों में देखें तो हम पाते हैं कि समाज पुन: प्राकृतिक जल स्रोतों को संज्ञान में ला रहे हैं। उनकी स्वच्छता व संरक्षण हेतु प्रयास पहल आदि कर रहे हैं । इसकी ज्वलंत तस्वीर डूंगरपुर जिले के ग्राम खड़गदा क्षेत्र के आसपास में बहने वाली मोरन नदी के लिए ग्रामीण सहभागिता से किए गए कार्यों को जल साक्षरता का अद्भुत उदाहरण माना जा सकता है। वर्तमान में हमारे द्वारा भावी पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए की किए जाने वाले जल प्रबंधन संबंधी शैक्षिक, सहशैक्षिक व व्यावहारिक कार्य जल साक्षरता के उदाहरण हैं जिन्हें जल साक्षरता के नाम से भी जाना जा सकता है। 

आज हमें कल के लिए जल साक्षर होना है। आस- पड़़ौस को जल साक्षर करना है,अन्यथा शिक्षित समाज भी अपनी अनियोजित प्राकृतिक दोहन शैली से स्वयं को असाक्षर घोषित करता स्वयं के साथ भविष्य का नाश सुनिश्चित कर देगा !

हमें कल के लिए फिर से साक्षर होना है, 

आस- पड़ोस को सोद्देश्य बताना है,

जल संरक्षण संवर्द्धन व प्रबंधन ही 

सही मायनों में जीवन का उन्नयन है।

सही मायनों में जीवन का उन्नयन है।।

सादर प्रस्तुति

डॉ. अमित कुमार  दवे, खड़गदा

9414567296

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