प्रकृति का सम्मान ही शक्ति की आराधना है ©डॉ. अमित कुमार दवे, खड़गदा
प्रकृति का सम्मान ही शक्ति की आराधना है ©डॉ. अमित कुमार दवे, खड़गदा इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी मूलावस्था रूप विद्यमान है , जो कुछ भी सात्विक है , जो कुछ भी चल-अचल रूप में विद्यमान है-वही प्रकृति है । ‘प्र’ पूर्वक प्रकृष्ट रूप में ‘कृति’से रचना अथवा सृष्टि का बोध होता है । अर्थात इस ब्रह्मांड की जीवनी शक्ति प्राणदात्री जीवनपूंज ही प्रकृति है । सांख्यकारअआचार्य कपिल मुनि के अनुसार प्रकृति ही संसार का (सृष्टि का) सार है प्रकृति के बिना संपूर्ण सृष्टि चेतना विहीन-सी है। आचार्य कपिल के अनुसार इस ब्रह्मांड में प्रकृति (स्त्री)एवं पुरुष रूपी दो मूल तत्व हैं। प्रकृति त्रिगुणात्मक स्वरूप धारण किए हुए है। इसमें सत्व, रज एवं तम गुणों की उपस्थिति है। यह संपूर्ण सृष्टि (जगत्) उक्त त्रिगुणात्मक प्रकृति ही वास्तव में संयुक्त रूप से परिणाम है । सांख्य के अनुसार सृष्टि का दूसरा तत्व है पुरुष , जो कि स्वयं सिद्ध एवं परम शक्तिमान है । तथापि पुरुष इस ब्रह्मांड में निष्क्रिय व अपरिवर्तनशील है । पुरुष सुख-दुख में सम रहता है। यह प्...