सूचना बनाम समझ

सूचना बनाम समझ
समाज को सूचनाओं की नहीं संस्कारों एवं समझ की आवश्यकता है। जिस समाज में केवल सूचनाओं का वर्चस्व है, वह समाज अपने समाज होने के दावे को स्वयं खारिज करता पतन को प्राप्त होता है। वर्त्तमान परिदृश्य में केवल सूचना की प्राप्ति-व्याप्ति को ही वैयक्तिक -सामाजिक समृद्धि का आधार बना देखा जा रहा है। जो किन्हीं भी परिस्थितियों के लिए उचित नहीं है।

©डॉ.अमित दवे, खड़गदा

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